The Politics of Death

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नई दिल्ली • राष्ट्रीय संस्करण • 08 दिसम्बर 2015


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“. . .अदालतों से मृत्युदण्ड प्राप्त अपराधी जिसके राष्ट्रपति को भेजे गये क्षमादान को भी खारिज कर दिया गया हो; ऐसे व्यक्ति को लेकर राजनीति करने वालों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा करना एक सुविचार है. . . ”

— Shabab Khan


पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई पर रोक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारतीय राजनीति का एक काला अध्याय बंद हो जाने की उम्मीद की जा सकती है। कई राज्य सरकारों ने हत्या के कुछ हाई प्रोफाइल मामलों में फांसी की सजा पा चुके अपराधियों के साथ अपनी एकजुटता दिखाकर कुछ जातीय-धार्मिक समुदायों के तुष्टीकरण की राजनीति चला रखी है।

तमिलनाडु और पंजाब में यह सिलसिला चल ही रहा है, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ राजनेताओं ने ऐसी ख्वाहिश जताई है। अदालत का फैसला इस पॉप्युलिस्ट पॉलिटिक्स के लिए एक सख्त संदेश तो है ही, इसके अगले संस्करणों के लिए एक नजीर भी है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे सभी मामलों में, जिसमें केंद्र सरकार के कानून के तहत और सीबीआई द्वारा मामले की जांच की गई हो, दोषियों को माफी देने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं होगा। राज्य को अगर किसी मामले में ऐसा जरूरी लगे तो उसे सजा माफी के लिए केंद्र से संपर्क करना पड़ेगा और केंद्र सहमत होगा तभी दोषी की सजा माफ की जा सकती है।

तमिलनाडु सरकार ने 19 फरवरी 2014 को राजीव गांधी हत्याकांड में मौत की सजा से राहत पाने वाले दोषियों और पहले से ही उम्रकैद की सजा काट रहे अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश जारी कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता सरकार के फैसले पर रोक लगाते हुए मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेज दिया था। ठीक यही खेल पंजाब में भी खेला जा रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी बलवंत सिंह रजोअना और इंडियन यूथ कांग्रेस के दफ्तर के आगे विस्फोट करने वाले देवेंद्र सिंह भुल्लर की सजा को लेकर भी ऐसा ही रुख अपनाया गया। अकाली दल की सरकार ने यह तक कह दिया कि राजोअना को फांसी देने से कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाएगी। माहौल ऐसा बनाया गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रजोअना की फांसी पर रोक लगा दी। भुल्लर की फांसी की सजा को तो सुप्रीम कोर्ट ने ही उम्र कैद में बदल दिया है। लेकिन जिस तरह इन दोनों का महिमामंडन किया गया, वह किसी को भी बेचैन कर देने के लिए काफी है।

देश में हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है। एक ही विचार किसी को प्रगतिशील लग सकता है, किसी को प्रतिगामी। लेकिन हमारे देश में कानून का शासन है और कानून द्वारा कुछ चीजें स्पष्ट तौर पर निर्धारित हैं। कानून के तहत किसी को अपराधी ठहरा दिए जाने के बाद उसको महिमामंडित करना पूरे देश का अपमान है। अगर कल हर जाति, समुदाय के लोग अपने बीच के अपराधियों को देवतुल्य बताने लगें तो क्या होगा?

दुर्भाग्य से पंजाब और तमिलनाडु की मौजूदा सरकारों ने कुछ ऐसा संकेत दिया है कि जिसके पक्ष में शोर मचाने वाले ज्यादा लोग होंगे, वह अपराध करके साफ बच जाएगा। अच्छा होगा कि यह किस्सा यहीं खत्म हो जाए।

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About Shabab Khan

A Journalist, Philanthropist; Author of 'The Magician', 'Go!', 'Brutal'. Being a passionate writer, I am into Journalism and writing columns, news stories, articles for top media house. Twitter: @khantastix khansworld@rediffmail.com
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